हिन्दी कविता— आत्मपरिचय | Hindi Poem Aatmparichay

नमस्कार, मैं अभी कुछ दिनों पहले हरिवंश राय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan) जी के द्वारा लिखी गई कुछ कविताएं (Hindi Poem) पढ़ रहा था मुझे उनके द्वारा लिखी गई यह कविता (Poem in Hindi) काफी अच्छी लगी इसलिए मैंने सोचा क्यों ना यह कविता आपके साथ भी शेयर की जाए।
इस कविता का Tittle है आत्मपरिचय 

हरिवंश राय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan) काफी अच्छे और प्रसिद्ध कवि रहे हैं इन्होंने अनेकों कविताएं लिखी हैं जो काफी प्रोत्साहित करती हैं।
इस कविता (Poem in Hindi) में उन्होंने यह बताने का प्रयास किया है अपने आपको जानना दुनिया को जानने से ज्यादा कठिन है जीवन से पूरी तरह निरपेक्ष रहना संभव नहीं है। चलिए इस कविता को विस्तार से पढ़ते हैं—

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Poem in Hindi

आत्मपरिचय


मैं जग–जीवन का भार लिए फिरता हूं,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूं,
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं सांसों के दो तार लिए फिरता हूं!

मैं स्नेह–सुरा का पान किया करता हूं,
मैं कभी ना जग का ध्यान किया करता हूं,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते हैं,
मैं अपने मन का गान किया करता हूं।

मैं निज उर के उद्-गार लिए फिरता हूं,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूं,
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता
मैं सपनों का संसार लिए फिरता हूं!

मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूं,
सुख दुख दोनों में मग्न रहा करता हूं,
जग भवसागर तरने को नाव बनाएं,
मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूं!

मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूं,
उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूं,
जो मुझ को बाहर हंसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूं!

कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादान वही है, हाय, जहां पर दाना!
फिर मूड़ ना क्या जग, जो इस पर भी सीखें?
मैं सीख रहा हूं, सीखा ज्ञान भुलाना!

मैं और, और जब और, कहां का नाता,
मैं बना बना कितने जग रोज मिटाता,
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!

मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूं,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूं,
हो जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वहां खंडहर का भाग लिए फिरता हूं!

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना,
क्यों कवि कह कर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूं एक नया दीवाना!

मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूं,
मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूं,
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूं!

दिन जल्दी जल्दी ढलता है!

हो जाए ना पथ में रात कहीं,
मंजल भी तो है दूर नहीं
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ो से झांक रहे होंगे,
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी जल्दी ढलता है!

मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊं किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी जल्दी ढलता है।

—हरिवंश राय बच्चन

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